उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suKHan ke shauqin to suna hai sanam bhi hain na

सुख़न के शौक़ीन तो सुना है सनम भी हैं ना

سخن کے شوقین تو سنا ہے صنم بھی ہیں نا

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुख़न के शौक़ीन तो सुना है सनम भी हैं ना
सो इस त'अल्लुक़ से उन को हम मोहतरम भी हैं ना

मिरी ग़ज़ल में लहू की ख़ुशबू पे क्यों है हैरत
मिरी ग़ज़ल में तुम्हारे शामिल करम भी हैं ना

ग़ज़ल में मतला' कहो तो हर-चंद देख लेना
कि मिसर’ओं के क़वाफ़ी आपस में ज़म भी हैं ना

ख़ता पे तुम ज़ाहिरन मु'आफ़ी तो चाहते हो
तुम्हारे सीने की आँखें ऐ दोस्त नम भी हैं ना

तू सात जन्मों के मुझ से वा'दे का कह रहा है
तुझी पे क़ुर्बां अगर हज़ारों जनम भी हैं ना

तुझे मुबारक कहूँ तो कैसे कहूँ मोहर्रम
कि तेरे अंदर वो कुछ कबीरा से ग़म भी हैं ना

सफ़ेद शाख़ों के पेड़ देखे तो छट से 'ताहिर'
कई परिंदे पुकार उठ्ठे कि हम भी हैं ना