उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suhulat aaegi dushwar se guzarte hue

सुहूलत आएगी दुश्वार से गुज़रते हुए

سہولت آئے گی دشوار سے گزرتے ہوئے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुहूलत आएगी दुश्वार से गुज़रते हुए
मैं दर बनाऊँगा दीवार से गुज़रते हुए

मुझे यक़ीन नहीं आ रहा कि ये मैं था
खड़ा हूँ अपने ही आसार से गुज़रते हुए

ज़ियादा-तर यहीं रह जाऊँगा कहीं बाक़ी
अभी तिरे गुल-ओ-गुलज़ार से गुज़रते हुए

‘अजाइबात की होती है एक दहशत भी
मैं डर गया तिरे असरार से गुज़रते हुए

ये वो सफ़र है कि जिस ने थका दिया है बहुत
पड़ा हूँ ख़्वाब-ए-गिराँ-बार से गुज़रते हुए

यही बहुत है तमाशा सा इक दिखा जाऊँ
शरार बन के ख़स-ओ-ख़ार से गुज़रते हुए

ख़रीदना नहीं कुछ मैं ने बेचना है 'ज़फ़र'
रुका हुआ हूँ जो बाज़ार से गुज़रते हुए