उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sona tha jitna ahd-e-jawani mein so liye

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए

سونا تھا جتنا عہد جوانی میں سو لیے

शायर: Saba Akbarabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए
अब धूप सर पे आ गई है आँख खोलिए

याद आ गया जो अपना गरेबाँ बहार में
दामन से मुँह लपेट लिया और रो लिए

अब और क्या करें तिरे तर्क-ए-सितम के बा'द
ख़ुद अपने दिल में आप ही नश्तर चुभो लिए

परवाना-ए-रिहाई-ए-ख़ामा तो मिल गया
लेकिन हुज़ूर अब दर-ए-ज़िंदाँ भी खोलिए

अपने लिए तअय्युन-ए-मंज़िल कोई नहीं
जो भीड़ जिस तरफ़ को चली साथ हो लिए

थी नागवार-ए-तब्अ तुझे सादगी-ए-इश्क़
ले आज हम ने पलकों में मोती पिरो लिए

हर इक ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश जहाँ हो सुख़न-शनास
बेहतर ये है 'सबा' कि वहाँ कुछ न बोलिए