उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dur tum se kabhi rahe hain hum

दूर तुम से कभी रहे हैं हम

دور تم سے کبھی رہے ہیں ہم

शायर: Saba Akbarabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दूर तुम से कभी रहे हैं हम
फिर भी देखो कि जी रहे हैं हम

ज़ब्त-ए-अश्क इक करिश्मा ही तो है
किस समुंदर को पी रहे हैं हम

दुश्मनों ने तो रहम खाया था
कुश्ता-ए-दोस्ती रहें हैं हम

मौत भी हम पे नाज़ करती है
हासिल-ए-ज़िंदगी रहे हैं हम

हमें बदला नहीं ज़माने ने
जो थे पहले वही रहे हैं हम

इन दरिंदों की भीड़ में भी 'सबा'
ख़ैर से आदमी रहे हैं हम