उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sochta hun ki apni raza ke liye chhoD dun

सोचता हूँ कि अपनी रज़ा के लिए छोड़ दूँ

سوچتا ہوں کہ اپنی رضا کے لیے چھوڑ دوں

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोचता हूँ कि अपनी रज़ा के लिए छोड़ दूँ
वो जो कहता है उस को ख़ुदा के लिए छोड़ दूँ

चूमने के लिए थाम रख्खूँ कोई दम वो हाथ
और वो पाँव रंग-ए-हिना के लिए छोड़ दूँ

शहर को सारे लोगों में तक़्सीम कर दूँ मगर
चंद गलियाँ मैं अपनी सदा के लिए छोड़ दूँ

ख़्वाहिशें तंग हैं दिल के अंदर अगर तुम कहो
ये कबूतर तुम्हारी फ़ज़ा के लिए छोड़ दूँ

कार-ए-मुश्किल तो है ही मगर मैं भी मजबूर हूँ
इब्तिदा को अगर इंतिहा के लिए छोड़ दूँ

मेरा हरगिज़ भी कोई भरोसा नहीं है अगर
मैं रवा को यहाँ ना-रवा के लिए छोड़ दूँ

ये भी मुमकिन है ख़ुद से किसी दिन गुज़रते हुए
अपने टुकड़े कहीं जा-ब-जा के लिए छोड़ दूँ

अब ये सोचा है मुट्ठी में उम्र-ए-बक़ाया मिरी
जो भी है एक देर-आश्ना के लिए छोड़ दूँ

ख़ुद से बाहर निकल जाऊँ मैं और ख़ुद को 'ज़फ़र'
कोई दिन जंगलों की हवा के लिए छोड़ दूँ