उर्दू शायरी · ग़ज़ल

so ye na ho ki falak se juda hi rah jae

सो ये न हो कि फ़लक से जुदा ही रह जाए

سو یہ نہ ہو کہ فلک سے جدا ہی رہ جائے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सो ये न हो कि फ़लक से जुदा ही रह जाए
हमारा ख़्वाब यहाँ पर पड़ा ही रह जाए

यही बहुत है कि आख़िर हमारे खाने को
तुम्हारे शह्र में ख़ाली हवा ही रह जाए

मिरा क़ुसूर नहीं है कि एक बार कोई
जो देख ले तो तुझे देखता ही रह जाए

'अजीब सूरत-ए-हालात हो अगर किसी दिन
ज़मीं पे ख़ल्क़ न हो और ख़ुदा ही रह जाए

ये ज़ोर है तो कहीं टूट ही न जाए कभी
ये ज़ख़्म है तो कोई दिन हरा ही रह जाए

हमें भी अब कोई परवा नहीं है बे-शक वो
लगा हुआ है जहाँ पर लगा ही रह जाए

अगरचे मैं न रहूँगा मगर ये मुमकिन है
किसी गली में ये मेरी सदा ही रह जाए

कोई निशाँ तो रहे सामने हमारे 'ज़फ़र'
कि मंज़िलें न सही रास्ता ही रह जाए