उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shuur-e-gham ko jaga iztirab paida kar

शुऊर-ए-ग़म को जगा इज़्तिराब पैदा कर

شعور غم کو جگا اضطراب پیدا کر

शायर: Chandra Parkash Jauhar Bijnauri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शुऊर-ए-ग़म को जगा इज़्तिराब पैदा कर
नफ़स नफ़स में नया इंक़लाब पैदा कर

शुआ-ए-नूर से ज़र्रों को दे के ताबानी
इक आफ़्ताब से लाख आफ़्ताब पैदा कर

नशात-ए-ग़म से मयस्सर है ज़िंदगी को फ़रोग़
नुमूद-ए-ग़म से ग़म-ए-बे-हिसाब पैदा कर

है इज़्तिराब में मुज़्मर तिरी हयात का राज़
सुकूँ का नाम न ले इज़्तिराब पैदा कर

शिकस्त-ए-जाम पे बुनियाद-ए-इशक़-ओ-मस्ती रख
शिकस्त-ए-रंग से कैफ़-ए-शराब पैदा कर

जहान-ए-नौ का तसव्वुर बजा सही लेकिन
जहान-ए-हुस्न का पहले जवाब पैदा कर

जो ज़िंदगी को बना दे इक आइना 'जौहर'
रुख़-ए-हयात में वो आब-ओ-ताब पैदा कर