उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shukr ki ja hai ki pasti mein yahin tak pahunche

शुक्र की जा है कि पस्ती में यहीं तक पहुँचे

شکر کی جا ہے کہ پستی میں یہیں تک پہنچے

शायर: Jagdish Sahay Saxena5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शुक्र की जा है कि पस्ती में यहीं तक पहुँचे
आसमाँ से जो गिरे हम तो ज़मीं तक पहुँचे

है ये तक़दीर की ख़ूबी कि निगाह-ए-मुश्ताक़
पर्दा बन जाए अगर पर्दा-नशीं तक पहुँचे

जाम ओ मीना की क़सम हस्ती-सहबा की क़सम
बादा-कश एक ही लग़्ज़िश में यक़ीं तक पहुँचे

ऐसी तक़दीर कहाँ है कि नसीम-ए-कू-ए-दोस्त
भूल कर राह किसी ख़ाक-नशीं तक पहुँचे

कर चुका रू-ए-ज़मीं का जो बशर काम तमाम
ये तमन्ना है कि अब चर्ख़-ए-बरीं तक पहुँचे