उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shor-sharabe ki bohtat ziyaada hai

शोर-शराबे की बोहतात ज़ियादा है

شور شرابے کی بہتات زیادہ ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शोर-शराबे की बोहतात ज़ियादा है
फ़ुर्सत कम रहती है बात ज़ियादा है

चारों सम्त उछलता रहता हूँ हर दम
काएनात से मेरी ज़ात ज़ियादा है

सोचता रहता हूँ लोगों और लफ़्ज़ों में
मेरा रिश्ता किस के साथ ज़ियादा है

रंज बहुत मा'मूली लगता है लेकिन
होता ये अक्सर-औक़ात ज़ियादा है

बाहर चलता रहता है झक्कड़ ख़ाली
अन्दर ही अन्दर बरसात ज़ियादा है

ज़ाती सा झगड़ा है मेरा और दिल का
और इस में भी उस का हात ज़ियादा है

मीठी बात भी काफ़ी होती है अक्सर
भूके को इतना ही भात ज़ियादा है

एक अकेली हो तो निमट सकता हूँ 'ज़फ़र'
आफ़त से फिर भी आफ़ात ज़ियादा है