उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shikwe hamein to jehd-e-mukarrar ke nahin hain

शिकवे हमें तो जेहद-ए-मुकर्रर के नहीं हैं

شکوے ہمیں تو جہد مکرر کے نہیں ہیں

शायर: Aabid Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शिकवे हमें तो जेहद-ए-मुकर्रर के नहीं हैं
हिजरत हुई है यूँ कि किसी घर के नहीं हैं

किस जुर्म में ये पहलू-तही हम से रवा है
ऐ शीशा-गरो हम कोई पत्थर के नहीं हैं

सर-बस्ता-ए-ज़ंजीर किया हम को जिन्हों ने
वो लोग उसी घर के हैं बाहर के नहीं हैं

किस दर्जा मुकर्रम हैं मिरे अश्क न पूछो
वो दाम मिले हैं कि जो गौहर के नहीं हैं

वो दर्द सहा है कि जो ग़ैरों का नहीं था
वो ज़ख़्म लगे हैं कि जो ख़ंजर के नहीं हैं