उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shikwa-e-dard-e-jigar ai mehrban kyun kar karen

शिकवा-ए-दर्द-ए-जिगर ऐ मेहरबाँ क्यूँ कर करें

شکوۂ‌ درد جگر اے مہرباں کیوں کر کریں

शायर: Yagana Changezi14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शिकवा-ए-दर्द-ए-जिगर ऐ मेहरबाँ क्यूँ कर करें
आप सुन क्यूँ कर सकें और हम बयाँ क्यूँ कर करें

अपनी बीती फिर सुनाएँगे कभी ऐ मेहरबाँ
शब की शब में ख़त्म सारी दास्ताँ क्यूँ कर करें

सैकड़ों ही फ़ित्ना-ए-ख़्वाबीदा जाग उट्ठेंगे फिर
नींद से चौंका के उन को सरगिराँ क्यूँ कर करें

फिर गया तलवार का मुँह थम गए बाज़ू-ए-दोस्त
क्यूँ अजल इस की तलाफ़ी सख़्त-जाँ क्यूँ कर करें

आती है पिछले पहर बस दिल धड़कने की सदा
राज़-दारान-ए-वफ़ा आह-ओ-फ़ुग़ाँ क्यूँ कर करें

फाँदना दीवार-ए-जन्नत का तो आसाँ है मगर
आप के दिल में जगह ऐ मेहरबाँ क्यूँ कर करें

इंक़िलाब-ए-दहर ने आँखों को अंधा कर दिया
आख़िर अब नज़्ज़ारा-ए-फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ क्यूँ कर करें

ना-तवानी का बुरा हो आह कर सकते नहीं
क्यूँ फ़लक अब जज़्ब-ए-दिल का इम्तिहाँ क्यूँ कर करें

इस तिलिस्म-ए-दहर में सर भी उठा सकते नहीं
कश्मकश में सैर-ए-नैरंग-ए-जहाँ क्यूँ कर करें

सर पटकते हैं अबस नक़्श-ए-क़दम पर देर से
आबला-पा जुस्तजू-ए-कारवाँ क्यूँ कर करें

होश में फिर कौन था जब दर्द का साग़र चला
आख़िर-ए-शब की वो कैफ़िय्यत बयाँ क्यूँ कर करें

हाथ फैलाया न जाएगा भरी महफ़िल में आज
सब्र की दौलत को साक़ी राएगाँ क्यूँ कर करें

झूम कर उठते हैं लेकिन फिर सँभल जाते हैं मस्त
सामना साक़ी का है गुस्ताख़ियाँ क्यूँ कर करें

फाड़े खाती है हमें ये मल्गजी पोशाक में
जामा-ए-तन की बताओ धज्जियाँ क्यूँ कर करें