उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aah-e-bimar kargar na hui

आह-ए-बीमार कारगर न हुई

آہ بیمار کارگر نہ ہوئی

शायर: Yagana Changezi12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आह-ए-बीमार कारगर न हुई
चर्ख़ काँपा मगर सहर न हुई

सुब्ह-ए-महशर हुई शब-ए-तारीक
सूरत-ए-यार जल्वा-गर न हुई

शब-ए-उम्मीद कट गई लेकिन
ज़िंदगी अपनी मुख़्तसर न हुई

दूर से आज उन को देख लिया
दिल को तस्कीं हुई मगर न हुई

आँखों आँखों में ले लिया वा'दा
कानों-कान एक को ख़बर न हुई

उफ़ री चश्म-ए-इताब उफ़ रे जलाल
बर्क़-ए-सोज़ाँ हुई नज़र न हुई

फ़िक्र-ए-अंजाम-ओ-हसरत-ए-आग़ाज़
दो-घड़ी चैन से बसर न हुई

खुलने वाला नहीं दर-ए-तौबा
फ़िक्र-ए-अंजाम वक़्त पर न हुई

ऐसा रोना भी कोई रोना है
आस्तीन आँसुओं से तर न हुई

हट के बालीं से लोग रोते हैं
जैसे बीमार को ख़बर न हुई

लुट गया सारा कारवाँ अदम
एक को एक की ख़बर न हुई

नीम-जाँ छोड़ कर चला क़ातिल
निगह-ए-'यास' कारगर न हुई