उर्दू शायरी · ग़ज़ल

agar apni chashm-e-nam par mujhe iKHtiyar hota

अगर अपनी चश्म-ए-नम पर मुझे इख़्तियार होता

اگر اپنی چشم نم پر مجھے اختیار ہوتا

शायर: Yagana Changezi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अगर अपनी चश्म-ए-नम पर मुझे इख़्तियार होता
तो भला ये राज़-ए-उल्फ़त कभी आश्कार होता

है तुनुक-मिज़ाज सय्याद कुछ अपना बस नहीं है
मैं क़फ़स को ले के उड़ता अगर इख़्तियार होता

ये ज़रा सी इक झलक ने दिल ओ जाँ को यूँ जलाया
तिरी बर्क़-ए-हुस्न से फिर कोई क्या दो-चार होता

अजी तौबा इस गरेबाँ की भला बिसात क्या थी
ये कहो कि हाथ उलझा नहीं तार-तार होता

वो न आते फ़ातिहा को ज़रा मुड़ के देख लेते
तो हुजूम-ए-'यास' इतना न सर-ए-मज़ार होता