उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shama raushan hai hamari aah se

शम्अ' रौशन है हमारी आह से

شمع روشن ہے ہماری آہ سے

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शम्अ' रौशन है हमारी आह से
लौ लगाए बैठे हैं अल्लाह से

चलते हैं क्या-क्या वो रस्ता काट कर
जब गुज़रते हैं हमारी राह से

क्यों न रक्खूँ मैं तबर्रुक की तरह
ग़म मिला है इश्क़ की दरगाह से

एक बोसे पर हमें टालें न आप
कुछ अलावा दीजिए तनख़्वाह से

माँग कर तुझ को बहुत नादिम हुआ
माँगना था और कुछ अल्लाह से

ख़ूबसूरत हो के तुम लड़ने लगे
बहस है दिन रात मेहर-ओ-माह से

तू ने वाइ'ज़ ज़िंदगी दुश्वार की
क्यों किया वाक़िफ़ ख़ुदा की राह से