उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham-e-umid jalate hue mar jaenge

शम-ए-उमीद जलाते हुए मर जाएँगे

شمع امید جلاتے ہوئے مر جائیں گے

शायर: Yahya Khan Yusuf Zai4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शम-ए-उमीद जलाते हुए मर जाएँगे
दश्त-ए-ज़ुल्मात बसाते हुए मर जाएँगे

हम पे इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम लगाएँगे लोग
और हम ज़ख़्म दिखाते हुए मर जाएँगे

शहर दर शहर है इक शो'ला-नवाई का चलन
लोग ये आग बुझाते हुए मर जाएँगे

आतिश-आमेज़ है दरियाओं में पानी का मिज़ाज
आब-कश प्यास बुझाते हुए मर जाएँगे