उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne miT jaane ka idrak liye phirta hun

अपने मिट जाने का इदराक लिए फिरता हूँ

اپنے مٹ جانے کا ادراک لئے پھرتا ہوں

शायर: Yahya Khan Yusuf Zai4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने मिट जाने का इदराक लिए फिरता हूँ
ख़त्म होती हुई इम्लाक लिए फिरता हूँ

आसमाँ मेरा इक इम्कान लिए फिरता है
और में मंतिक़-ए-अफ़्लाक लिए फिरता हूँ

ख़ाक पावँ से न लगती थी कभी लेकिन अब
ख़ाक और बाद की पोशाक लिए फिरता हूँ

कितनी टूटी हुई बिखरी हुई दुनिया है ये
ख़ाक उड़ाता हूँ जिगर चाक लिए फिरता हूँ