उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab wahi lekin nazara aur hai

शब वही लेकिन नज़ारा और है

شب وہی لیکن نظارا اور ہے

शायर: G R Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब वही लेकिन नज़ारा और है
रौशनी कम है सितारा और है

कश्तियाँ तो एक जैसी हैं तमाम
हैं अलग दरिया किनारा और है

इस तरफ़ लहरों का मंज़र है अलग
उस तरफ़ पानी का धारा और है

मुश्तरक हैं मंज़िलें लेकिन सफ़र
है जुदा उन का हमारा और है

पहले कहते थे सनम को माहताब
अहद-ए-नौ का इस्तिआरा और है

रूह के दम से है उस की काएनात
जिस्म को किस का सहारा और है

बन रहा है अब जो धरती पे 'कँवल'
वो जहाँ सारे का सारा और है