उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajnabi rahguzar ke the hi nahin

अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं

اجنبی رہ گزر کے تھے ہی نہیں

शायर: G R Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं
हम जिधर थे उधर के थे ही नहीं

छोड़ कर अपना घर कहाँ जाते
हम किसी और घर के थे ही नहीं

कैसे आते वो हम-सफ़र वापस
जो हमारे सफ़र के थे ही नहीं

जो न आए हमारे दामन में
फल हमारे शजर के थे ही नहीं

वो नज़ारे जो हम से दूर रहे
वो हमारी नज़र के थे ही नहीं

साथ चलते किसी के हम कब तक
हम पराई डगर के थे ही नहीं

चल दिए छोड़ कर जो यार 'कँवल'
वो हमारे नगर के थे ही नहीं