उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ana ki qaid se aazad ho kar kyon nahin aata

अना की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यों नहीं आता

انا کی قید سے آزاد ہو کر کیوں نہیں آتا

शायर: G R Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अना की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यों नहीं आता
जो बाहर है वो मेरे दिल के अंदर क्यों नहीं आता

उड़ान उस की अगर मेरे ही जैसी है फ़ज़ाओं में
तो क़द उस का मिरे क़द के बराबर क्यों नहीं आता

मैं पहले शीशा-ए-दिल को किसी खिड़की में रख आऊँ
फिर उस के बाद सोचूँगा कि पत्थर क्यों नहीं आता

छुपा लेती है दुनिया किस तरह ये ज़हर बरसों तक
धुआँ जो दिल के अंदर है वो बाहर क्यों नहीं आता

कोई तक़्सीम का माहिर अगर मिल जाए तो पूछूँ
कि हर क़तरे के हिस्से में समुंदर क्यों नहीं आता

हज़ारों आश्ना होते हैं लेकिन आड़े वक़्तों में
ज़रूरत जिस की होती है मयस्सर क्यों नहीं आता

'कँवल' फ़नकार के बारे में ये भी इक मुअ'म्मा है
जो अब तक आ चुका है उस से बेहतर क्यों नहीं आता