उर्दू शायरी · ग़ज़ल

daricha ho ki dar uljha hua hai

दरीचा हो कि दर उलझा हुआ है

دریچہ ہو کہ در الجھا ہوا ہے

शायर: G R Kanwal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दरीचा हो कि दर उलझा हुआ है
मिरा तो घर का घर उलझा हुआ है

बदन के पेच-ओ-ख़म तो झेल लेते
क़यामत है कि सर उलझा हुआ

बड़ी सीधी है चाहत मंज़िलों की
मगर ज़ौक़-ए-सफ़र उलझा हुआ है

न जाने क्या हुआ है आदमी को
जिधर देखो उधर उलझा हुआ है

'कँवल' कटता है मेरा वक़्त जिस में
वो दफ़्तर बेशतर उलझा हुआ है