उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab ki aaghosh mein jaga hua ghar kis ka hai

शब की आग़ोश में जागा हुआ घर किस का है

شب کی آغوش میں جاگا ہوا گھر کس کا ہے

शायर: Aabid Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब की आग़ोश में जागा हुआ घर किस का है
उस पे आसेब नहीं है तो असर किस का है

ऐसा सैलाब कि जंगल को बहा ले जाए
ऐसे सैलाब में बे-बर्ग शजर किस का है

उँगलियों में उतर आए हैं बसारत के रुमूज़
तीरगी में रहे मख़्फ़ी ये हुनर किस का है

बे-चराग़ी ही रही अपने घरों की मीरास
रौशनी पूछती फिरती है कि दर किस का है

वो मुसाफ़िर तो गया छोड़ के यादें अपनी
किस को बतलाऊँ कि ये ज़ाद-ए-सफ़र किस का है

तुम मिरी राह से हो कर नहीं गुज़रे हो तो फिर
नक़्श-ए-पा ये तरफ़-ए-राहगुज़र किस का है

फिर से मदहोश-ए-तमन्ना के हुए होश-ब-जा
हम पे 'आबिद' ये करम बार-ए-दिगर किस का है