उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab ka surma bhi nahin subh ka ghaza bhi nahin

शब का सुर्मा भी नहीं सुब्ह का ग़ाज़ा भी नहीं

شب کا سرمہ بھی نہیں صبح کا غازہ بھی نہیں

शायर: Usman Habib6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब का सुर्मा भी नहीं सुब्ह का ग़ाज़ा भी नहीं
कोई तमसील तिरे हुस्न को ज़ेबा भी नहीं

देख लेंगे जो हुआ जिस से सर-ए-कोह-ए-विसाल
तू ख़ुदा भी नहीं है और मैं मूसा भी नहीं

कोई ग़म फिर तुझे लाहक़ है मगर ऐ मिरे दिल
तेरा रोना कभी इक बात का तो था भी नहीं

तज़किया हो गुल-ए-एहसास हुवैदा हो जाए
ऐसा पैकर तो अभी चाक पे आया भी नहीं

ये मैं तन्हा वो तिरी माँग कि गौहर ही गुहर
देखा जाए तो तग़ाफ़ुल तिरा बेजा भी नहीं

एक परतव ने किया शाख़चा-ए-दिल पे 'अयाँ
बार ऐसा कि गुल-ए-शौक़ हुवैदा भी नहीं