उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qasid-e-dil na sahi dushman-e-jaan bhejta hai

क़ासिद-ए-दिल न सही दुश्मन-ए-जाँ भेजता है

قاصد دل نہ سہی دشمن جاں بھیجتا ہے

शायर: Usman Habib6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ासिद-ए-दिल न सही दुश्मन-ए-जाँ भेजता है
'इश्क़ के ज़िम्न में वो कुछ तो यहाँ भेजता है

बरसर-ए-बज़्म महक तक से जो आता नहीं पास
अपनी पोशिश भी वो गुल बा’द-अज़ाँ भेजता है

किस तरह सुल्ह का इम्कान बरामद हो भला
उस को सर नज़्र करें तो वो सिनाँ भेजता है

रूठ कर भेज भी देता है हमें ख़ुद ही से दूर
फिर वहाँ ख़ुद चला आता है जहाँ भेजता है

कौन 'आलम है ख़ुदावंद इज़ाला कुन का
मौत के हीले से हम को तू कहाँ भेजता है

उस का ग़म क्यों न उठावें ब-सर-ओ-चश्म 'हबीब'
बारवर हैं तो हमें बार-ए-गराँ भेजता है