उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shayad apne hi kisi kaam se bahar nikla

शायद अपने ही किसी काम से बाहर निकला

شاید اپنے ہی کسی کام سے باہر نکلا

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शायद अपने ही किसी काम से बाहर निकला
इक सितारा जो मिरी शाम से बाहर निकला

मैं भी थक-हार के अन्दर की तरफ़ पल्टा हूँ
वो भी आख़िर दिल-ए-नाकाम से बाहर निकला

किस लिए जा के फँसा था मुझे मा'लूम नहीं
और किस तरह तिरे दाम से बाहर निकला

घर में बैठा रहा शर्मिंदा-ए-शोहरत हो कर
आज मैं एक नए नाम से बाहर निकला

ख़ास ही कोई मलामत मिरे दरपेश आई
जब भी मैं दायरा-ए-'आम से बाहर निकला

कोई तूफ़ान उठाए रखा अन्दर उस ने
और फिर वो बड़े आराम से बाहर निकला

उस का मतलब था कोई और ही पहले से अलग
एक पैग़ाम जो पैग़ाम से बाहर निकला

की है तरदीद-ए-मोहब्बत कभी उस ने भी 'ज़फ़र'
न कभी मैं ही इस इल्ज़ाम से बाहर निकला