उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shamil-e-arz-e-hunar kar ke riya-kari ko

शामिल-ए-'अर्ज़-ए-हुनर कर के रिया-कारी को

شامل عرض ہنر کر کے ریاکاری کو

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शामिल-ए-'अर्ज़-ए-हुनर कर के रिया-कारी को
आख़िर आसान किया रोज़ की दुश्वारी को

आग भड़के तो सही ताब-ए-तमाशा है बहुत
खोल कर सीना हवा देता हूँ चिंगारी को

भूक वो नश्शा-ए-नाज़ुक है कि जब टूटेगा
जी तरस जाएगा इस तरह की सरशारी को

लोग हैं मेरे ही जैसे मिरा हिस्सा ही तो हैं
दिल को समझाता हूँ बहलाता हूँ बेज़ारी को

है यही मन्ज़र-ओ-माहौल तो बेजा क्या है
मैं अगर ख़्वाब समझता रहा बेदारी को

सिक्का-ए-दिल था मिरी जेब में वो भी खोटा
घर से निकला था मैं ख़्वाबों की ख़रीदारी को

बात भी हम से न की शोख़ ने सीधे मुँह से
सब से आगे थे हमीं उस की तरफ़-दारी को

कोई सूरत हो ज़मानत पे रिहाई की 'ज़फ़र'
इतने अय्याम हुए मेरी गिरफ़्तारी को