उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham ki shaKH-e-shikasta barqarar-e-naghma hai

शाम की शाख़-ए-शिकस्ता बरक़रार-ए-नग़्मा है

شام کی شاخ شکستہ برقرار نغمہ ہے

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम की शाख़-ए-शिकस्ता बरक़रार-ए-नग़्मा है
मतला-ए-ख़ामोश से उतरी क़तार-ए-नग़्मा है

रंग सींचा या किसी ने सुर बिखेरा चार सू
पर्दा-ए-पर्दाज़ पर नक़्श-ओ-निगार-ए-नग़्मा है

आबशार-ए-ख़ामुशी है कोहसारों से उधर
ख़ाकसारों के यहाँ जो इंतिज़ार-ए-नग़्मा है

थरथराती सरसराती सनसनाती सा'अतो
थम रहो इस रास्ते पर शहसवार-ए-नग़्मा है

रंग सा या राग सा पहुचानियो ये बाग़ सा
हू के 'आलम में यही परवरदिगार-ए-नग़्मा है

शश-जिहत के इस छतारे से कशाकश ही सही
कहने को इन उँगलियों को इख़्तियार-ए-नग़्मा है

बुझने वाले अब बुझेंगे लर्ज़िश-ए-मस्ताना से
या'नी इन अफ्सुर्दागाँ को ए'तिबार-ए-नग़्मा है