उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham hote hi Thikane pe bhi aa sakta hai

शाम होते ही ठिकाने पे भी आ सकता है

شام ہوتے ہی ٹھکانے پہ بھی آ سکتا ہے

शायर: Aadarsh Dubey4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम होते ही ठिकाने पे भी आ सकता है
दिल परिंदा है निशाने पे भी आ सकता है

जिस को दिन रात मनाने में लगी है दुनिया
वो मेरे एक बुलाने पे भी आ सकता है

दुख तो ये है के मैं जिस दुख में गिरफ़्तार हुआ
वो ही दुख कल को ज़माने पे भी आ सकता है

अब अगर और यूँ ही चलता रहा ये रिश्ता
जीने मरने के दहाने पे भी आ सकता है