उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sauda hai jo dil de ke KHaridar se uljhe

सौदा है जो दिल दे के ख़रीदार से उलझे

سودا ہے جو دل دے کے خریدار سے الجھے

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सौदा है जो दिल दे के ख़रीदार से उलझे
सुलझे हुए हम से न कभी यार से उलझे

होने न दिया रश्क ने इज़्हार-ए-तमन्ना
हर बात में हम अपनी ही गुफ़्तार से उलझे

उलझाव से उलझाव हैं इस इश्क़ में या-रब
दिल-दार से अटके थे कि अग़्यार से उलझे

क्या सैर हो शाने से लड़े गर दिल-ए-सद-चाक
एक एक गिरफ़्तार गिरफ़्तार से उलझे

अटके तो किसी चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ से अटके
उलझे तो किसी तुर्रा-ए-तर्रार से उलझे

चोरी से भी पहुँचे न तिरे घर में कभी हम
बरसों यूँही ख़ार-ए-सर-ए-दीवार से उलझे

खुलते नहीं तुम 'दाग़' उलझती है तबीअ'त
अच्छे किसी अय्यार से मक्कार से उलझे