उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sarae chhoD ke wo phir kabhi nahin aaya

सराए छोड़ के वो फिर कभी नहीं आया

سرائے چھوڑ کے وہ پھر کبھی نہیں آیا

शायर: Iftikhar Naseem4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सराए छोड़ के वो फिर कभी नहीं आया
चला गया जो मुसाफ़िर कभी नहीं आया

हर एक शय मिरे घर में उसी के ज़ौक़ की है
जो मेरे घर में ब-ज़ाहिर कभी नहीं आया

ये कौन मुझ को अधूरा बना के छोड़ गया
पलट के मेरा मुसव्विर कभी नहीं आया

मकाँ हूँ जिस में कोई भी मकीं नहीं रहता
शजर हूँ जिस पे कि ताइर कभी नहीं आया