उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ban gaya hai jism guzre qafilon ki gard sa

बन गया है जिस्म गुज़रे क़ाफ़िलों की गर्द सा

بن گیا ہے جسم گزرے قافلوں کی گرد سا

शायर: Iftikhar Naseem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बन गया है जिस्म गुज़रे क़ाफ़िलों की गर्द सा
कितना वीराँ कर गया मुझ को मिरा हमदर्द सा

क्या अभी तक उस का रस्ता रोकती है कोई सोच
मेरे हाथों में है उस का हाथ लेकिन सर्द सा

इस तरह घुल-मिल गया आ कर नए माहौल में
वो भी अब लगता है मेरे घर का ही इक फ़र्द सा

जज़्ब था जैसे कोई सूरज ही उस के जिस्म में
दूर से वो संग लगता था ब-ज़ाहिर सर्द सा

आज तक आँखों में है मंज़र बिछड़ने का 'नसीम'
पैरहन मेला सा उस का और चेहरा ज़र्द सा