उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand phir taron ki ujli rezgari de gaya

चाँद फिर तारों की उजली रेज़गारी दे गया

چاند پھر تاروں کی اجلی ریز گاری دے گیا

शायर: Iftikhar Naseem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद फिर तारों की उजली रेज़गारी दे गया
रात को ये भीक कैसी ख़ुद भिकारी दे गया

टाँकती फिरती हैं किरनें बादलों की शाल पर
वो हवा के हाथ में गोटा कनारी दे गया

कर गया है दिल को हर इक वाहिमे से बे-नियाज़
रूह को लेकिन अजब सी बे-क़रारी दे गया

शोर करते हैं परिंदे पेड़ कटता देख कर
शहर के दस्त-ए-हवस को कौन आरी दे गया

उस ने घायल भी किया तो कैसे पत्थर से 'नसीम'
फूल का तोहफ़ा मुझे मेरा शिकारी दे गया