उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samjhe hain misl-e-kah mujhe marte hain log

समझे हैं मिस्ल-ए-काह मुझे मारते हैं लोग

سمجھے ہیں مثل کاہ مجھے مارتے ہیں لوگ

शायर: Yaqoob Parwaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समझे हैं मिस्ल-ए-काह मुझे मारते हैं लोग
कितने हैं कम-निगाह मुझे मारते हैं लोग

इतना भी एहतिजाज गवारा नहीं उन्हें
भरता हूँ जब भी आह मुझे मारते हैं लोग

माना कि तेरे अद्ल का डंका है चार सू
लेकिन ऐ कज-कुलाह मुझे मारते हैं लोग

तय है कि फिर गिरा दिया जाउँगा चाह में
पहले बरून-ए-चाह मुझे मारते हैं लोग

यूँ भी फ़रोग़ देते हैं अपने दरोग़ को
ला कर कोई गवाह मुझे मारते हैं लोग