उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyon tirgi pe tumko guman chandni ka hai

क्यों तीरगी पे तुम को गुमाँ चाँदनी का है

کیوں تیرگی پہ تم کو گماں چاندنی کا ہے

शायर: Yaqoob Parwaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यों तीरगी पे तुम को गुमाँ चाँदनी का है
आख़िर ये रंग रूप कहाँ चाँदनी का है

ज़ुल्मत का इश्तिहार बने फिर रहे हैं हम
सोचो अगर तो ये भी ज़ियाँ चाँदनी का है

ये रौशनी का शहर है कैसा कि अब यहाँ
देखा जिसे भी नौहा-कुनाँ चाँदनी का है

इस शहर-ए-बे-चराग़ से आओ निकल चलें
वो इस लिए कि शोर यहाँ चाँदनी का है

ना-बीनगी के रोग में हैं मुब्तला वही
'पर्वाज़' जिन का अपना मकाँ चाँदनी का है