उर्दू शायरी · ग़ज़ल

samajh rahe the ki baadal hain sar pe chhae hue

समझ रहे थे कि बादल हैं सर पे छाए हुए

سمجھ رہے تھے کہ بادل ہیں سر پہ چھائے ہوئے

शायर: Chand Kakralvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

समझ रहे थे कि बादल हैं सर पे छाए हुए
मगर ग़ुबार पे नज़रें थे हम जमाए हुए

तमाम रात अलाओ पे काटने के लिए
सुने गए कई क़िस्से सुने-सुनाए हुए

झुलस रहा है बदन धूप की तमाज़त से
उमीद सूखे दरख़्तों से हैं लगाए हुए

अदा न कर सके हम क़र्ज़ तेरी चाहत का
तिरी गली से गुज़रते हैं सर झुकाए हुए

वो जिन की ख़ून पसीने से आब्यारी की
उन्हीं दरख़्तों के हासिल हमें न साए हुए

वो क्या समझते उजालों की अहमियत ऐ 'चाँद'
जिन्हें चराग़ मिले थे जले जलाए हुए