उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahn raushan na ek makan raushan

सहन रौशन न इक मकाँ रौशन

صحن روشن نہ اک مکاں روشن

शायर: Parwez Rahmani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सहन रौशन न इक मकाँ रौशन
चेहरा चेहरा उदासियाँ रौशन

ज़ेहन-दर-ज़ेहन वस्ल-ए-बे-ज़ारी
जिस्म-दर-जिस्म सर्दियाँ रौशन

गाँव-दर-गाँव तीरगी के पड़ाव
शहर-दर-शहर बिजलियाँ रौशन

भर सफ़र धूप कुफ़्र करती हुई
ना तरफ़ सर पे साएबाँ रौशन

सोचते रह गए नज़र वाले
कर गए यार जिस्म-ओ-जाँ रौशन

कितने आलम हयात से छूटे
तब हुआ एक ख़ाक-दाँ रौशन

नूर ने घर किया निगाहों में
हो गए सात आसमाँ रौशन