उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sahafi KHud ko jo batla rahe hain

सहाफ़ी ख़ुद को जो बतला रहे हैं

صحافی خود کو جو بتلا رہے ہیں

शायर: Yasir Tahsin5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सहाफ़ी ख़ुद को जो बतला रहे हैं
दलाली की कमाई खा रहे हैं

बग़ावत दूर की कौड़ी है वो तो
मज़म्मत तक नहीं कर पा रहे हैं

सज़ा तो हो चुकी है तय हमारी
अभी बस जुर्म सोचे जा रहे हैं

दग़ा से बाज़ आओ मीर 'जा'फ़र'
हमारे लोग मारे जा रहे हैं

जहाँ हर शख़्स मुर्दा हो चुका था
हम ऐसे दौर में ज़िंदा रहे हैं