उर्दू शायरी · ग़ज़ल

safar kaisa ye karna paD raha hai

सफ़र कैसा ये करना पड़ रहा है

سفر کیسا یہ کرنا پڑ رہا ہے

शायर: Chand Kakralvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सफ़र कैसा ये करना पड़ रहा है
शरारों से गुज़रना पड़ रहा है

फ़ज़ाएँ तो मो'अत्तर हो रही हैं
गुलाबों को बिखरना पड़ रहा है

किसी को ज़िंदगी देने की ख़ातिर
हमें हर रोज़ मरना पड़ रहा है

बदन में हैं हज़ारों ज़ख़्म फिर भी
समंदर में उतरना पड़ रहा है

जहाँ चलते हुए जलते हैं तलवे
वहाँ हम को ठहरना पड़ रहा है

शिकम से बाँध कर शा'इर के पत्थर
ग़ज़ल का पेट भरना पड़ रहा है