उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sadiyon tawil raat ke zanu se sar uTha

सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा

صدیوں طویل رات کے زانو سے سر اٹھا

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सदियों तवील रात के ज़ानू से सर उठा
सूरज उफ़ुक़ से झाँक रहा है नज़र उठा

इतनी बुरी नहीं है खंडर की ज़मीन भी
इस ढेर को समेट नए बाम-ओ-दर उठा

मुमकिन है कोई हाथ समुंदर लपेट दे
कश्ती में सौ शिगाफ़ हों लंगर मगर उठा

शाख़-ए-चमन में आग लगा कर गया था क्यूँ
अब ये अज़ाब-ए-दर-बदरी उम्र भर उठा

मंज़िल पे आ के देख रहा हूँ मैं आइना
कितना ग़ुबार था जो सर-ए-रहगुज़र उठा

सहरा में थोड़ी देर ठहरना ग़लत न था
ले गर्द-बाद बैठ गया अब तो सर उठा

दस्तक में कोई दर्द की ख़ुश्बू ज़रूर थी
दरवाज़ा खोलने के लिए घर का घर उठा

'क़ैसर' मता-ए-दिल का ख़रीदार कौन है
बाज़ार उजड़ गया है दुकान-ए-हुनर उठा