उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabz-baghon pe dosh dharte hue

सब्ज़-बाग़ों पे दोष धरते हुए

سبز باغوں پہ دوش دھرتے ہوئے

शायर: Mahboob Mashmiri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब्ज़-बाग़ों पे दोष धरते हुए
सहल था वा'दों से मुकरते हुए

आइने को अक़ब से देखना था
सामने से उसे सँवरते हुए

क्या बताऊँ जो दिल पे गुज़री है
आज मुँह फेर कर गुज़रते हुए

साँस बाहर ही रोक ली मैं ने
ख़ाली सीने में आह भरते हुए

आँख पिघली तो जम गया आँसू
जाने क्या याद आया मरते हुए

होंट रक्खे थे पहले हाथों पर
आग चूमी थी डरते डरते हुए

सर से छत ही गँवा ली है 'महबूब'
सीढ़ियाँ चढ़ते और उतरते हुए