उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaina ruKH pe be-naqab hua

आइना रुख़ पे बे-नक़ाब हुआ

آئنہ رخ پہ بے نقاب ہوا

शायर: Mahboob Mashmiri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आइना रुख़ पे बे-नक़ाब हुआ
हुस्न ख़ुद अपना इंतिख़ाब हुआ

क़ैस मिलता तो फिर बताता उसे
मैं तिरे दश्त में ख़राब हुआ

उस का चेहरा पढ़ा और इतना पढ़ा
ऐसे में साहिब-ए-किताब हुआ

उस की आँखों में प्यास चमकी थी
आबदीदा हूँ क्यों न आब हुआ

शाख़ पर उस ने अपना लम्स रखा
और मैं खिल उठा गुलाब हुआ

आब-ए-सादा ने उस के होंट चखे
घूँट भरते समय शराब हुआ

जाने किस नींद को हुआ 'महबूब'
जाने किस आँख का वो ख़्वाब हुआ