उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baat ke bich bol uThte ho

बात के बीच बोल उठते हो

بات کے بیچ بول اٹھتے ہو

शायर: Mahboob Mashmiri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बात के बीच बोल उठते हो
तुम इशारा नहीं समझते हो

कहीं दीवार तो नहीं हूँ मैं
क्यों मिरे साथ लग के बैठते हो

चाहता हूँ मुझे पता तो चले
कुछ तो है यार कुछ तो चाहते हो

काश तुम होते दिल के हमसाए
कौन हो और कहाँ पे रहते हो

रोज़ मैं आइने से पूछता हूँ
देखे देखे हुए से लगते हो

कौन सा कोना दूँ तुम्हें दिल का
बोझ दिल का कहीं तो फेंकते हो

सुन के अच्छा लगा मुझे 'महबूब'
मेरे बारे में इतना सोचते हो