उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabhi se dur bayaban mein rah rahe hain hum

सभी से दूर बयाबाँ में रह रहे हैं हम

سبھی سے دور بیاباں میں رہ رہے ہیں ہم

शायर: Saabir Usmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सभी से दूर बयाबाँ में रह रहे हैं हम
न सुन रहे हैं किसी की न कह रहे हैं हम

रवाँ नदी तो नहीं है मगर हवा के संग
ग़ुबार बन के ज़माने से बह रहे हैं हम

किसी ग़रीब के टूटे हुए मकाँ की तरह
ज़रा ज़रा ही सही रोज़ ढह रहे हैं हम

खुली किताब सी ये ज़िंदगी हमारी है
वरक़ वरक़ हैं उड़े सब न तह रहे हैं हम

भटक रहे हैं तबस्सुम की चाह दिल में लिए
मिले है रंज फ़क़त जिस जगह रहे हैं हम

हमें भी खुल के चमकने नहीं दिया 'साबिर'
जिसे हो अब्र ने घेरा वो मह रहे हैं हम