उर्दू शायरी · ग़ज़ल

abr-e-kohsar teri aas ke mare hue hum

अब्र-ए-कोहसार तिरी आस के मारे हुए हम

ابر کوہسار تری آس کے مارے ہوئے ہم

शायर: Saabir Usmani5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब्र-ए-कोहसार तिरी आस के मारे हुए हम
मर ही जाएँ न कहीं प्यास के मारे हुए हम

अपनी तक़दीर कहाँ राम सी ऐ अहल-ए-जहाँ
घर न आ पाएँगे बनवास के मारे हुए हम

क्या सँवारेंगे कभी हाल कभी मुस्तक़बिल
एक मुद्दत से हैं इतिहास के मारे हुए हम

भूल जाना तुम्हें आसान कहाँ आज भी है
भूल सकते नहीं एहसास के मारे हुए हम

जो भी जीने का असासा है रखेंगे गिरवी
वर्ना मर जाएँगे इफ़्लास के मारे हुए हम