उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sabhi do-ghaDi ke hain mehman yahan roz kis ka qiyam hai

सभी दो-घड़ी के हैं मेहमाँ यहाँ रोज़ किस का क़ियाम है

سبھی دو گھڑی کے ہیں میہماں یہاں روز کس کا قیام ہے

शायर: Tabish Raihan8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सभी दो-घड़ी के हैं मेहमाँ यहाँ रोज़ किस का क़ियाम है
जो वफ़ा की राह में मिट गई उसी ज़िंदगी को दवाम है

ये उसूल कैसा उसूल है ऐ फ़क़ीह-ए-शहर जवाब दे
वही तू करे तो हलाल है वही मैं करूँ तो हराम है

इसी आब-ओ-ताब के साथ ही हाँ जहाँ में बाक़ी है आज भी
जो न मिट सका न बदल सका वो कलाम रब का कलाम है

मुझे हक़ ही क्या जो तिरे सिवा किसी दूसरे से करूँ वफ़ा
मिरा नफ़्स तेरा ग़ुलाम है मिरी ज़िंदगी तिरे नाम है

मिलीं मुजरिमों को मुआ'फ़ियाँ हुईं बे-ख़ताओं को फाँसियाँ
ये उसूल कैसा उसूल है ये निज़ाम कैसा निज़ाम है

तू नहीं जो ऐ मिरे हम-नशीं तो जहाँ की रुत ही बदल गई
न वो धूप है न वो छाँव है न वो सुब्ह है न वो शाम है

उसे अपने पास बिठाऊँ क्यों दिल-ओ-जान उस पे लुटाऊँ क्यों
जो है फ़ित्ना-परवर-ओ-ख़ुद-ग़रज़ उसे दूर ही से सलाम है

सर-ए-बज़्म 'ताबिश'-ए-ख़ुश-नवा तू न छेड़ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा
ये है शैख़-ए-वक़्त की ख़ानकह यहाँ शेर-गोई हराम है