उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chhoD ke farzanon ki mahfil tanha is diwane ko

छोड़ के फ़र्ज़ानों की महफ़िल तन्हा इस दीवाने को

چھوڑ کے فرزانوں کی محفل تنہا اس دیوانے کو

शायर: Tabish Raihan8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छोड़ के फ़र्ज़ानों की महफ़िल तन्हा इस दीवाने को
हज़रत-ए-नासेह क्यों आ जाते हैं अक्सर समझाने को

कम-ज़र्फ़ों के दर की ग़ुलामी मेरे बस की बात नहीं
ऐसे जीने पर मैं क्यों तरजीह न दूँ मर जाने को

मौत से जिन को डर लगता है होंगे वो लोग और कोई
हर लम्हा तय्यार हैं हम तूफ़ाँ से आँख मिलाने को

ये है मस्जिद वो है मंदिर ये है कलीसा वो गुरुद्वार
बाँट दिया कितने हिस्से में हम ने इबादत-ख़ाने को

मौत के डर से सब ख़ामोश रहेंगे ये ना-मुम्किन है
कोई न कोई तो उट्ठेगा बातिल से टकराने को

नफ़रत और अदावत की ता'लीम जहाँ दी जाती है
जी करता है आग लगा दूँ ऐसे इबादत-ख़ाने को

अज़्म-ए-सादिक़ ले कर जब दरिया में कोई उतरेगा
आएँगी फिर मौजें ख़ुद ही कश्ती पार लगाने को

'ताबिश' बस ये सोच के मैं ने आग लगा दी कश्ती में
भूल के भी अब कोई न सोचे लौट के वापस जाने को