उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gesu-e-hosh-o-matanat ko bikharne na diya

गेसू-ए-होश-ओ-मतानत को बिखरने न दिया

گیسوئے ہوش و متانت کو بکھرنے نہ دیا

शायर: Tabish Raihan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गेसू-ए-होश-ओ-मतानत को बिखरने न दिया
मैं ने चाहत को कभी हद से गुज़रने न दिया

दर-ब-दर मुझ को लिए फिरती रही फ़िक्र-ए-मआ'श
दो घड़ी चैन से इक दर पे ठहरने न दिया

बस इसी डर से कि हर्फ़ आए न तुझ पर हम ने
तेरी तस्वीर को आँखों में उभरने न दिया

ख़ुद कभी तुम ने भलाई का किया काम न कुछ
उस पे ये ज़ुल्म कि औरों को भी करने न दिया

राह में कितने ही ख़ुश-रंग नज़ारे थे मगर
मुझ को मंज़िल की तमन्ना ने ठहरने न दिया

ज़िंदा रक्खा है हर इक दौर में बे-शक 'ताबिश'
एक फ़न-कार को फ़न ने कभी मरने न दिया