उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sab jise kahte hain waqf-e-gham-e-jaanan hona

सब जिसे कहते हैं वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जानाँ होना

سب جسے کہتے ہیں وقف غم جاناں ہونا

शायर: Kaif Moradaabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सब जिसे कहते हैं वक़्फ़-ए-ग़म-ए-जानाँ होना
अव्वलीं शर्त है उस के लिए इंसाँ होना

ग़म के दाग़ों ने बड़ा काम बनाया दिल का
इस सियह-ख़ाने में मुश्किल था चराग़ाँ होना

अपने परतव के सिवा ज़ेहन में कुछ भी न रहा
और सिखलाइए आईनों को हैराँ होना

उफ़ ये दीवानगी-ए-इश्क़ कि इस बज़्म में भी
जब कभी होश में आना तो परेशाँ होना

बज़्म-ए-आलम हो कि महशर मेरी दानिस्त में है
इक तजल्ली का कई रुख़ से नुमायाँ होना

ख़ार-ओ-ख़स को भी निगाहों में रखें अहल-ए-चमन
वर्ना मुमकिन नहीं तंज़ीम-ए-बहाराँ होना

दिल के टुकड़े सर-ए-दामन पे लिए बैठा हूँ
खेल समझा था इलाज-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ होना

मेरा किरदार है ज़ाहिर मिरे अशआ'र से 'कैफ़'
जैसे तस्वीर में इक रंग नुमायाँ होना