उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saz-e-ulfat hai mere saz-e-jigar hone tak

साज़-ए-उल्फ़त है मिरे साज़-ए-जिगर होने तक

ساز الفت ہے مرے ساز جگر ہونے تک

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साज़-ए-उल्फ़त है मिरे साज़-ए-जिगर होने तक
हुस्न दिलकश है मिरे ज़ौक़-ए-नज़र होने तक

अज़्म-ए-इंसाँ ने सितारों पे कमंदें डालीं
मंज़िलें दूर हैं सरगर्म-ए-सफ़र होने तक

बारहा नन्हा सा दिल ख़ून हुआ ज़ेर-ए-फ़लक
ग़ुंचे पर गुज़री है क्या क्या गुल-ए-तर होने तक

रिफ़अतें कौन सी है छू न सके जिन को ख़याल
हद-ए-पर्वाज़ है तख़्ईल के पर होने तक

ज़िंदगी तल्ख़ हक़ीक़त है कि एक ख़्वाब-ए-हसीं
कौन समझा है इसे उम्र बसर होने तक

कर गई तुझ को परेशाँ मिरी आशुफ़्ता-सरी
ये यक़ीं था न तिरी आँख के तर होने तक

हम सर-ए-शाम जलाते हैं तसव्वुर के चराग़
कौन देखेगा तिरी राह सहर होने तक

तेरे वा'दे कभी शर्मिंदा-ए-ईफ़ा न हुए
वर्ना जीता तिरे आने की ख़बर होने तक

वा'दा बे-कैफ़ है बे-रंग है गुलज़ार 'हबीब'
दिल है सूना सा तिरी लुत्फ़-ए-नज़र होने तक