उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saz-e-hasti pe agar gao to kuchh baat bane

साज़-ए-हस्ती पे अगर गाओ तो कुछ बात बने

ساز ہستی پہ اگر گاؤ تو کچھ بات بنے

शायर: Jafar Raza8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साज़-ए-हस्ती पे अगर गाओ तो कुछ बात बने
शे'र बन जाएँ जो ये घाव तो कुछ बात बने

ये फ़ुतूहात-ए-ख़ला क्या हैं ब-जुज़ तार-ए-हरीर
ज़ात के पर्दों को सरकाओ तो कुछ बात बने

अहल-ए-बीनश हो बने आइवरी-टावर में तो क्या
कभी दीवानों से टकराओ तो कुछ बात बने

ज़ुल्मत-ए-शब में ये तन्हाई गला घोंट न दे
शीशा-ए-कर्ब ही चमकाओ तो कुछ बात बने

इल्म-ओ-दानिश की महकती हुई पुर्वाइयो काश
मेरे सीने में उतर आओ तो कुछ बात बने

ज़ुल्म का साथ न दो मस्लहत-अंदेशी में
आओ हक़-गोयों में आ जाओ तो कुछ बात बने

जिस्म में रूह किराए के मकाँ में जैसे
रूह को अपना बना पाओ तो कुछ बात बने

इन रज़ीलों की ज़बाँ-दानी अयाज़न-बिल्लाह
सय्यद-'इंशा' को बुला लाओ तो कुछ बात बने