उर्दू शायरी · ग़ज़ल

saqiya abr hai de jam shitab ek par ek

साक़िया अब्र है दे जाम शिताब एक पर एक

ساقیا ابر ہے دے جام شتاب ایک پر ایک

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

साक़िया अब्र है दे जाम शिताब एक पर एक
आज महफ़िल में गिरे मस्त-ए-शराब एक पर एक

गुल-ए-बाज़ी है हसीनों में मिरा अफ़्साना
फेंक देता है मोहब्बत की किताब एक पर एक

जोश पर है जो तिरा हुस्न तो ऐ पर्दा-नशीं
रोज़ करता है ग़ज़ब बंद-ए-नक़ाब एक पर एक

तोड़ इस तरह से ऐ नाला-ए-दिल सातों फ़लक
कि गिरें टूट के ये ख़ाना-ख़राब एक पर एक

लब-ए-जू सैर को आया है जो वो बहर-ए-जमाल
टूटा पड़ता है तमाशे को हबाब एक पर एक

याद आती है उन्हें दम-ब-दम इक बात नई
रोज़ आता है मिरे ख़त का जवाब एक पर एक

जब कभी 'दाग़' किया हम ने सवाल-ए-बोसा
सैकड़ों उस ने दिए सख़्त जवाब एक पर एक